आयुष राम – बिहार का वो नौजवान जिसने अपनी मेहनत और नेकदिली से बदली हज़ारों ज़िंदगियाँ
बिहार के आयुष राम की प्रेरणादायक कहानी, जिन्होंने प्रोजेक्ट शालिनी के ज़रिए हज़ारों बच्चों और गरीब परिवारों की ज़िंदगी रोशन की।
आयुष राम – बिहार का वो नौजवान जिसने अपनी मेहनत और नेकदिली से बदली हज़ारों ज़िंदगियाँ
बिहार के नालंदा ज़िले के छोटे से गाँव धरहरा में 4 फरवरी को जन्मे एक साधारण से बालक ने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन वो हज़ारों ज़िंदगियों में उम्मीद की किरण बन जाएगा। उस बालक का नाम है आयुष राम, जिन्हें लोग प्यार से सिद्धार्थ अभिनव या राम के नाम से भी जानते हैं।
उनके पिता विकी राज भारतीय रेल में कार्यरत हैं और माता सुमन देवी एक गृहिणी हैं। एक सामान्य परिवार में जन्मे आयुष की कहानी आज देशभर के युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है।
शिक्षा और प्रारंभिक संघर्ष
आयुष की पढ़ाई जीआईपी पब्लिक स्कूल, पावापुरी से शुरू हुई और आगे उन्होंने PW विद्यापीठ, पटना में अपनी पढ़ाई जारी रखी। साल 2024 में उन्होंने एक नेशनल लेवल की स्कॉलरशिप परीक्षा दी और पूरे भारत में 98 प्रतिशत अंक लाकर ऑल इंडिया टॉपर बने।
इसके बाद उन्होंने कंप्यूटर साइंस के क्षेत्र में भी ऑल इंडिया टॉपर का खिताब जीता और तीन बार स्टेट टॉपर रहे। भारत सरकार और शिक्षा मंत्रालय ने उन्हें प्रमाणित भी किया। मेहनत और लगन के साथ उन्होंने मास्टर इन कंप्यूटर साइंस की उपाधि प्राप्त की।
जब किस्मत ने दी एक सुनहरी उड़ान
आयुष की प्रतिभा को पहचानने वाले थे श्री सचिन कुमार अतुलकर, जो खुद एक बड़ी हस्ती हैं। उन्होंने आयुष की काबिलियत देखकर उनका साथ दिया। आयुष ने खुद की डिज़ाइन की हुई एक बिल्डिंग का प्रोजेक्ट देश के बड़े उद्योगपतियों के सामने रखा और सबको उनका डिज़ाइन पसंद आया।
इसके बाद आयुष को GIP कंस्ट्रक्शन कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में नियुक्त किया गया। उनके काम और ईमानदारी ने सभी का दिल जीत लिया।
शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति – प्रोजेक्ट "शालिनी" का जन्म
सितंबर 2024 में आयुष ने Vidyadaan Pvt. Ltd. में चीफ एडवाइज़र के रूप में जुड़कर शिक्षा क्षेत्र में काम शुरू किया। उन्होंने कई स्कूलों का निरीक्षण किया, खामियों को सुधारा और गरीब बच्चों के लिए नि:शुल्क शिक्षा अभियान शुरू किया।
मार्च 2025 में उन्होंने एक नया प्रोजेक्ट शुरू किया – प्रोजेक्ट शालिनी, जिसे उद्योगपति अनिल अग्रवाल ने लॉन्च किया। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य था हर ज़रूरतमंद तक शिक्षा, भोजन और आश्रय पहुँचाना।
आज प्रोजेक्ट शालिनी के तहत
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4,400 से अधिक बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा मिल रही है
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526 मरीजों का मुफ़्त इलाज हुआ है
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1,800 से ज़्यादा लोगों को रोजगार मिला, जिनमें आधी संख्या महिलाओं की है
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कई अनाथ आश्रम और स्कूल खोले और संचालित किए जा रहे हैं
प्रोजेक्ट शालिनी आज देश के प्रमुख एनजीओ में से एक बन चुका है — एक ऐसा नाम जो हज़ारों दिलों में बस गया है।
संघर्ष और सच्चाई की जीत
सफलता के साथ-साथ कुछ चुनौतियाँ भी आईं। कुछ संस्थानों ने उनके खिलाफ झूठी शिकायतें दर्ज कीं। जांच के बाद सच्चाई सामने आई और आयुष निर्दोष साबित हुए। उनके खिलाफ साज़िश रचने वालों का लाइसेंस निलंबित कर दिया गया।
इन मुश्किलों के बावजूद आयुष रुके नहीं — उन्होंने अपने काम और सेवा को जारी रखा।
एक मिसाल, एक सोच, एक प्रेरणा
आज आयुष राम सिर्फ़ एक नाम नहीं, बल्कि एक विचारधारा हैं — कि अगर नीयत सच्ची हो तो कोई मंज़िल मुश्किल नहीं।
उनके मेंटर सचिन अतुलकर कहते हैं –
“मैं आयुष में खुद को देखता हूँ — क्योंकि उसने अपनी काबिलियत को समाज की सेवा में लगाया।”
आयुष की कहानी यह साबित करती है कि भगवान सबको सब कुछ नहीं देता, पर किसी को इतना काबिल बना देता है कि वो सबको दे सके।
बिहार की धरती से उठे इस नौजवान ने यह दिखा दिया कि सपने छोटे कस्बों से भी पूरे किए जा सकते हैं, बशर्ते हौसले बड़े हों।
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